राज्य मे पिछड़े वर्ग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के पदोन्नति आरक्षण के खिलाफ लाया गया शाशन निर्णय रद्द करे केन्द्रीय मानवाधिकार संगठन की मांग

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राज्य में पिछड़े वर्ग के अधिकारियों/कर्मचारियों के पदोन्नती आरक्षण के खिलाफ दि. ०७/०५/२०२१ को लिया गया शासन निर्णय रद्द करे और २५/०५/२००४ का पदोन्नती आदेश को पूर्ववत करे: केंद्रीय मानवाधिकार संघटन नई दिल्ली

भंडारा:-पिछड़ा वर्ग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की पदोन्नति में ३३ प्रतिशत आरक्षण वर्तमान राज्य सरकार द्वारा निरस्त किये जाने से पिछडावर्ग के अधिकारियों कर्मचारियों पर सरकार द्वारा अन्याय किया गया। वर्तमान सरकारके द्वारा पदोन्नती आरक्षण के खिलाफ लिया गया दि. ०७ मई २०२१ का आदेश निरस्त किया जाये और साल सन २००४ मे लिया गया पदोन्नती आरक्षण के संदर्भ का आदेश तत्काल पूर्ववत कार्यान्वयन करने की मांग का निवेदन मा. उद्धवजी ठाकरे, मुख्यमंत्री महाराष्ट्र राज्य, महामहिम राज्यपाल भगतसिंग कोश्यारी एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मा. शरदचंद्रजी पवार को मान. जिल्हाधिकारी साहेब भंडारा के मार्फत आज दिया गया।
पदोन्नति कोटे में रिक्त पदों को वरिष्ठता के अनुसार भरने के संबंध में सरकार का निर्णय ०७/०५/२०२१ को जारी किया गया एवं खुली श्रेणी से पिछड़े वर्ग के कर्मचारियों के ३३% आरक्षित पदों सहित सभी रिक्त पदों को भरने के लिए एक अवैध सरकारी निर्णय लिया गया है।
याचिका संख्या २७९७/२०१५ पर मा. उच्च न्यायालय, सामान्य प्रशासन विभाग के दिनांक ०४/०८/२०१७ के पत्र के अनुसार प्रदेश में पिछड़ा वर्ग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण निरस्त करने के बाद दि. २९/१२/२०१७ को दिये गये आदेश के अनुसार पिछड़ा वर्ग के अधिकारी/ कर्मचारियों को ओपन कैटेगरी के साथ-साथ सीनियर कैटेगरी से प्रमोशन मिलने से रोक दिया गया है।
मा. उच्च न्यायालय मुंबई, मा. सर्वोच्च न्यायालय को पिछड़े वर्ग के अधिकारियों और कर्मचारियों को वरिष्ठता के अनुसार खुली श्रेणी से पदोन्नति प्राप्त करने में कोई समस्या नहीं है। प्रदेश के सभी पिछड़ा वर्ग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा दि. २९/१२/२०१७ के पत्र रद्द करने और विशेष अनुमति याचिका के अधिन पदोन्नति आरक्षण की मांग की गयी थी।
महाराष्ट्र सरकार ने १८/०२/२०१९ को एक शाशन निर्णय जारी किया और पिछड़े वर्ग के अधिकारियों / कर्मचारियों के लिए पदोन्नति श्रेणी के साथ खुली श्रेणी में १००% पदों को भरने की नीति की घोषणा की। उसके बाद राज्य के सभी पिछड़ा वर्ग के अधिकारियों और कर्मचारियों की आपत्ति के बाद दि. २०/०४/२०१९ को संशोधित सरकार के फैसल से कुछ राहत मिली। दि. २०/०४/२०१९ को जारी किया गया शाशन निर्णय अधिक्रमीत धरकर दिनांक १८/१२/२०१९ के अनुसार, ०७ /०५/ २०१९ को एक नया सरकारी आदेश जारी किया गया है। इस शासनादेश के अनुसार सरकार ने पिछड़ा वर्ग के सभी पदों को केवल पदोन्नति कोटे से भरने का आदेश देकर पिछड़ा वर्ग के पदोन्नति में आरक्षण को समाप्त करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय भारत के संविधान के अनुच्छेद 16 (4-ए) के अनुसार विरोधाभासी है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय में महाराष्ट्र सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका संख्या २८३०६/२०१७ के खिलाफ है।
इसी प्रकार पिछड़े वर्ग के अधिकारियों/कर्मचारियों की खुली श्रेणी से पदोन्नती के स्थान पर पदोन्नती की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। एक ओर, महाराष्ट्र सरकार ने १७ जुलाई २०१९ को मान. सर्वोच्च न्यायालय को एक स्पष्टीकरण आवेदन प्रस्तुत किया है कि सरकार को पिछड़े वर्गों के पदोन्नती में आरक्षण लागू करने का आदेश दिया जाएं और ४०००० पिछड़ा वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी आरक्षित वर्ग से पदोन्नती दे। सर्वोच्च न्यायालय में अपील करते हुए, राज्य सरकार ने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित ३३ प्रतिशत पदों को नष्ट करने और उन्हें खुली श्रेणी बनाने में सरकार की भूमिका आरक्षण विरोधी प्रतीत होती है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय पर इसके प्रभाव की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
राज्य में आर. के. सबरवाल बनाम पंजाब सरकार (१९९५) के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार, कुल संवर्ग संख्या के आधार पर अंक मौजूद हैं, पदोन्नति कोटे में ३३% आरक्षित पदों को खुली श्रेणी मे वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है।
महाराष्ट्र सरकार का दिनांक ०७ मई २०२१ का निर्णय असंवैधानिक और मा. सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका नीति से असंगत है। ०७/०५/२०२१ के शाशन निर्णय से राज्य के सभी पिछड़े वर्ग के अधिकारियों और कर्मचारियों में तीव्र असंतोष का माहौल पैदा कर दिया है। कोविड-19 की वर्तमान महामारी के दौरान पिछड़े वर्ग के अधिकारियों/कर्मचारियों को उनके अधिकारों से वंचित करने की सरकार की भूमिका पर ११ मई २०२१ को हुई बैठक में हजारों पिछड़ा वर्ग के अधिकारियों/कर्मचारियों की वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से भागीदारी के साथ ०७ मई २०२१ के फैसले के खिलाफ तीखी नाराजगी व्यक्त की गई है।

निवेदन मे राज्य के मा. राज्यपाल, मा. मुख्यमंत्री से केंद्रीय मानवाधिकार संघटन नई दिल्ली के पदाधिकारी व कार्यकर्ताऔंने अनुरोध किया है की, महाराष्ट्र राज्य में पिछड़े वर्ग के अधिकारियों/कर्मचारियों के खिलाफ लिए गये संविधान विरोधी सरकार के आदेश को तुरंत रद्द करें और एक नया नियम जारी करें।
मा. मुंबई उच्च न्यायालय ने याचिका सं. २७९७/२०१५ के मामले में चूंकि पदोन्नति में आरक्षण ०४/०८/२०१७ को दिए गए निर्णय द्वारा अमान्य घोषीत कर दिया गया है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अभी तक माननीय उच्च न्यायालय मुंबई के निर्णय पर रोक नहीं लगाई है। ३३ प्रतिशत आरक्षित पदों को रिक्त रखते हुए खुली श्रेणी में सभी रिक्तियां भरी जानी चाहिए। दि. २५/०५/२००४ के शासन आदेश के अनुसार पदोन्नति में आरक्षण का लाभ देकर वरिष्ठता सूची में शीर्ष स्थान पर आने वाले पिछड़ा वर्ग के अधिकारियों/कर्मचारियों को शासनादेश जारी करने का अनुरोध करते है।
यदि दि. ०७/०५/२०२१ का पदोन्नती आरक्षण विरोधी आदेश तत्काल रद्द नहीं किया गया और सन २००४ का शासनादेश लागु नही किया गया तो पूरे महाराष्ट्र राज्य में विभिन्न संगठनों द्वारा आंदोलन शुरू कर दिया जायेगा और होनेवाली अनहोनी की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। इसे राज्य सरकार ने गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
सदर निवेदन की प्रतीयां मा. उपमुख्यमंत्री, अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग आरक्षण समिति महाराष्ट्र राज्य, मा. नितिनजी राउत ऊर्जा मंत्री महाराष्ट्र राज्य, मा. श्रीमती वर्षाताई गायकवाड़ शालेय शिक्षा मंत्री महाराष्ट्र राज्य मुंबई, मा. के.सी. पाड़वी आदिवासी विकास मंत्री, राज्य मंत्रालय, एंव महाराष्ट्र राज्य के मा. मुख्य सचिव, महाराष्ट्र राज्य, मुंबई को भी दि गई।
निवेदन देते वक्त संघटन के महाराष्ट्र राज्य प्रभारी डॉक्टर देवानंद नंदागवळी, विदर्भ सचिव महेंद्र तिरपुडे, भंडारा जिल्हाध्यक्ष श्रीकांतजी शहारे, मंगेश हुमणे, सूर्यकांत हुमणे ( उपमहासचिव कास्ट्राईब कल्याण महासंघ पुणे), रमेश यावलकर, प्रा. भीमराव बन्सोड, अनिल चचाणे, हेमाताई गजभिये, दिपाली नंदेश्वर, विजय नंदागवळी हरिश्चंद धांडेकर आदी कार्यकर्तागण उपस्थित थे।

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